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कोई नहीं जो हरा सके मुझे…मेरी मर्जी के बगैर दुनिया से जो ले जा सके मुझे -संजीव

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कोई नहीं जो हरा सके मुझे…मेरी मर्जी के बगैर दुनिया से जो ले जा सके मुझे -संजीव श्रीवास्तव

बलरामपुर जिलाधिकारी के कैंप कार्यालय पर कार्यरत (स्टेनो) संजीव श्रीवास्तव जोकि बेहद सरल एवं मृदुभाषी व्यक्तित्व के धनी हैं, को जब कोरोना जैसी बीमारी ने घेरा तो उन्हें इलाज के लिए अस्पताल तक तो जाना पड़ा लेकिन उनके हौसले को कोरोना जैसी गंभीर बीमारी भी नहीं तोड़ पाई। कोरोना से लड़ते हुए उन्होंने एक ऐसी कविता की रचना की जिसके पढ़ने मात्र से उनके हौसले और हिम्मत का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह कविता दूसरों के लिए प्रेरणा स्रोत भी साबित हो रही है।

पढ़िए ……..

आज वक्त ने जब मुझे यूँ पटका है
कर दिया है मुझे चित्त चारों खाने

पड़ा हूं बिस्तर पर लाचार ,
कमजोर और बदहवास

पर फिर भी इसमें कुछ तो अच्छा ही है,
मुद्दतों बाद अपना घर और बच्चों को दिन मे करीब से देखा है

पर हाय री किस्मत छू भी नही सकता उनको,
चलो यह भी जिंदगी को जीने का एक मौका है

उठूंगा फिर से
कुछ दिनों मे मैं

है कोई नहीं जो हरा सके मुझे………
मेरी मर्जी के बगैर इस दुनिया से जो ले जा सके मुझे……….

तुझे मैं दूंगा पटखनी ऐसी
तू देखेगा जल्द ही

हमेशा अपनी शर्तों पर जी है मैंने ये जिंदगी
बिखेरूँगा फिर से अपनी मुस्कान दुनिया में…….

चमकेंगे फिर से चेहरे मेरे चाहने वालों के।
लुटाऊंगा तब इतनी खुशियां मैं…….

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